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Welcome to Narayan Arya Kanya Pathshala P. G. College Farrukhabad

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  • 631

Narayan Arya Kanya Pathshala P. G. College

Welcome to our College

Affiliated By : Chatrapati Sahuji Maharaj Kanpur University

For : Only for Girls

 Sahabganj, Narayan Das Street, Farrukhabad, Uttar Pradesh

Farrukhabad, Farrukhabad : 0

  •   
  • nakp50@yahoo.com

School, College, University

Amenities: First Aid , Sannitation

A Little About Us

महर्षि दयानंद सरस्वती (1824 ई.-1883 ई.) भारतीय नव जागरण के पुरोधा तथा आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद का जन्म सन 1824 ई. में गुजरात प्रांत के मैरवी जनपद के अंतर्गत टंकारा नामक ग्राम में एक कुलीन, सम्पन्न ब्राहाण परिवार में पिताश्री करसन जी के यहाँ हुआ| बाल्यकाल में उन्हीने परम्परागत रीति से विद्याध्ययन किया| शिवरात्रि के व्रत का पालन करते हुए जब बालक मूलशंकर (दयानन्द सरस्वती) ने एक चूहे को शिव पिंडी पर चढ़ कर प्रसाद खाते हुए देखा तो उनकी मूर्तिपूजा से आस्था समाप्त हो गई| इसी प्रकार छोटी बहिन की आकस्मिक मुत्यु ने उन्हें मानव जीवन की नश्वरता का अहसास कराया| वह भरी जवानी में सन्यासी बन गए और गृह व परिवार त्याग दिया तथा स्वजीवन को लोक हितार्थ अर्पित कर दिया| स्वामी जी ने दो वर्षो तक मथुरा में वेदों के मर्म स्वामी विरजानंद जी दण्डी के सानिध्य में रहकर, अष्टाध्यायी, महाभाष्य आदि आर्य ग्रंथो का अध्ययन किया तत्पश्चात गंगा तट से जुड़े प्रान्तों में भ्रमण कर वैदिक धर्म का उपदेश देते रहे|
सन 1877 ई. में उन्होंने बम्बई में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की| सन 1877 ई. में धर्म-प्रचारार्थ विभिन्न प्रदेशो के नगरो में गये जिनमे अपने नगर फर्रुखाबाद में व इसी जनपद के अन्य स्थानी में भी धर्म प्रचार किया और वैदिक शिक्षाओ को प्रचारित कर जनमानस में वेद प्रतिपादित सत्य सनातन वैदिक धर्म का उपदेश देते रहे| यहाँ स्वामीजी ने आठ बार प्रवास किया उनके द्वारा आर्य समाज फर्रुखाबाद की स्थापना 12 जुलाई, 1879 को संपन्न हुई| स्वामी जी सच्चा राष्ट्रवादी थे| स्वधर्म, स्वभाषा, स्वसंस्कृति तथा स्वराष्ट्र की अलख जगाने हेतु उन्होंने गैरक्षा का महत्व बतलाया| स्त्री शिक्षा, भारतीय समाज में उसकी महत्ता और सहभागिता पर विशेष बल दिया| देश की भावनात्मक एकता के सूत्र में बाधने के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने की प्रेरणा दी| महर्षि दयानन्द सरस्वती मूलतः धार्मिक पुरुष थे, परन्तु उन्होंने धर्म की जो व्याख्या की वह किसी मनुष्य द्वारा संस्थापित मत या सम्प्रदाय का पर्याय न होकर मानव के सर्वागीं उत्थान में उन गुणों की समष्टि का नाम है, जिन के कारण मनुष्य में सच्ची मानवता का विकास होता है| उनकी दृष्टि में मनुष्य वही है, जो अपने तुल्य अन्यो को भी समझे तथा सबके प्रति सत्य, न्याय व धर्म का व्यवहार करे|


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